मैं नहीं जानता

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ख्यालों में, मनुष्य, इंसान में, फर्क, अंतर, भेद है,
लोग गलती करके कहते हैं, असुविधा के लिए खेद है,
लेकिन मैं अगर यही कहूँ तो कोई मुझे न मानता,
क्यों दुनिया है इतनी रूठी मुझसे, मैं नहीं जानता।

अल्फाज़ मेरे मुझसे बिछड़ गए हैं, जाने गए कहाँ,
दूजों की ही मर्ज़ी जैसे चलती है, बनती है यहाँ,
पर वो क्या जानें मुझमें नहीं है वो महानता,
कैसे दूँ सवालों के जवाब उन्हें, मैं नहीं जानता।

पाठशाला से निकलते,पढ़ते पहुँचे हैं कार्यालय,
लेकिन पता नहीं कब सपनों पे आया महाप्रलय,
अपना ही अपने को अब नहीं पहचानता,
कैसे जताऊँ वो हमदर्दी दुःख में, मैं नहीं जानता।

पहले विद्या हेतु धन, फिर धन हेतु विद्या, है यही दस्तूर,
जाने क्यों पालती है दुनिया अजनबी सा ये फ़ितूर,
बचपन का बरामदा ही है अब यादें संभालता,
क्यों भागा वो लुका-छिपी से ऐसे, मैं नहीं जानता।

अमीर, अमीर हो रहा है, गरीब, गरीब हो रहा है,
रोशनी जाती रही तो अँधेरा करीब हो रहा है,
उगते सूरज को भी ताकत से हर असुर है ढालता,
क्यों फँसा हूँ इस अँधेर कुँए में, मैं नहीं जानता।

ज़रूरत है एक हाथ की, ऐसे किसी के साथ की,
करूणा में जिसने थामी हो उँगली एक अनाथ की,
ऐसा जो है बेबसों की नज़रों को पुकारता,
कहाँ है वो जीवनदाता, मैं नहीं जानता।

चढ़ रहा हूँ संभल-संभल के यूँ हज़ारों सीढ़ियाँ,
सोच कैसे धाक जमा रही परायी पीढि़याँ,
इष्ट है या माया जिस भगवान को मैं पुकारता,
कब होगी मेरी अरदास पूरी वो, मैं नहीं जानता।

आ जाए फ़रिश्ता एक, लेके कुछ इरादे नेक,
मिट जाएँ गमों के साये, एक घड़ी में देख अनेक,
वक्त से जो लड़-झगड़ के उलझनें सुधारता,
चुकाऊँ कैसे ऋण ये जिसका, मैं नहीं जानता।

आया हूँ एक मोड़ पे, जहाँ कोई नहीं होड़ में,
कोसों दूर उस दुनिया से, रमी जो तोड़-फोड़ में,
दिख रहा वो आसमां है जो ज़मीं सँवारता,
यकीन करूँ भी या न इसका, मैं नहीं जानता।

भरोसा करके मिल रहा है चमकीला सा एक सुकून,
जग रहा है, जीने में, इस सीने में, अलग जुनून,
सफलता का साया आज घर को है पधारता,
क्या परोसूँ अब भोजन में उसे, मैं नहीं जानता।

खिल रही हैं पर्वतों की ये हसीन वादियाँ,
कर रहे हैं वर-वधू भी प्रेम रस में शादियाँ,
चंद्रमा की रोशनी को अब कोई नहीं नकारता,
कैसे मनाऊँ जश्न उस जोश का, मैं नहीं जानता।

उड़ रहे हैं यूँ अरस, मौत भी गइ तरस,
जाने कितने लगेंगे उसे मुझे सिधारने को बरस,
निराशा की आत्मा कफ़न से कोई नहीं निकालता,
कैसे-कब हुई गुलज़ार ये ज़िंदगी, मैं नहीं जानता।

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लेखक: Aditya Seetha

1 thought on “मैं नहीं जानता

  1. एक बेहद गंभीर कविता।काफी समय बाद किसी नवीन लेखक द्वारा रचित इस स्तर की हिंदी कविता पढ़ी। आप के उज्जवल भविष्य के लिए मंगलकामनाएं।

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